Chittorgarh Fort – चित्तौड़गढ़ ( Chittorgarh )

Chittorgarh Fort – चित्तौड़गढ़ ( Chittorgarh )

Chittorgarh चित्तौड़गढ़ को भक्ति व शक्ति की नगरी तथा राजस्थान का गौरव कहा जाता है।

दर्शनीय स्थल माध्यमिका – Chittorgarh चित्तौड़गढ़ से 13 किमी. दूर स्थित यह नगर बौद्ध एवं वैष्णव मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ गुप्तकालीन कला के अवशेष मिले हैं, जिनका उत्खनन कार्य सर्वप्रथम 1904 में डॉ. भण्डारकर तथा कालान्तर में (1962 ई.) केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा किया गया।

अकोला : Chittorgarh चित्तौड़गढ़ से 70 किमी. दूर स्थित छीपों का द्वीप अकोला राजस्थान के समृद्ध रंगाई- छपाई केन्द्रों में से एक है। यहाँ प्राकृतिक एवं खनिज रंगों का उपयोग (चीड़, तिल्ली-तेल व मोम से तैयार) दाबू छपाई में किया जाता है।

सत बीस देवरी : 11वीं शताब्दी में निर्मित भव्य जैन मंदिर जिसमें 27 देवरियाँ स्थित होने के कारण यह सत बीस देवरी कहलाता है।

भदेसर : यहाँ असावरा माता का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ लकवा के मरीजों को उपचार हेतु लाया जाता है।

श्री सांवलिया जी का मंदिर : Chittorgarh चित्तौड़गढ़ से लगभग 40 किमी. दूर मण्डफिया नामक ग्राम में स्थित इस मंदिर में जल झूलनी एकादशी मेला भरता है।

चन्देरिया : यहाँ ब्रिटेन के सहयोग से एशिया का सबसे बड़ा जिंक स्मेल्टर संयंत्र स्थित है, जिसे सीसे व जस्ते के भण्डारों का अधिकतम उपयोग संभव बनाने हेतु केन्द्र सरकार के सहयोग से स्थापित किया गया है।

बस्सी : Chittorgarh चित्तौड़गढ़ से लगभग 25 किमी. दूर स्थित कठपूतली व खिलौने निर्माण के लिए प्रसिद्ध स्थल।

जैन कीर्ति स्तम्भ-प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित 22 मीटर ऊंचे इस स्तम्भ का निर्माण 12वीं शताब्दी में दिगम्बर सम्प्रदाय के बघेरवाल महाजन सानाय के पुत्र जीजा नामक धर्मावलम्बी द्वारा करवाया गया।

सांवरिया जी का मंदिर : Chittorgarh चित्तौड़गढ़ से 40 किमी. दूर मण्डफिया गाँव में सांवरिया जी (श्रीकृष्ण जी) का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।

Chittorgarh Fort – चित्तौड़गढ़ का किला

Chittorgarh
Chittorgarh Fort – चित्तौड़गढ़ का किला

– ‘गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी गलैया’ उक्ति को चरितार्थ करने वाले इस दुर्ग का निर्माण मौर्य शासक चित्रांगद मौर्य (कुमारपाल प्रबंध के अनुसार चित्रांग) ने 1810 फीट ऊँचे पठार पर गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम स्थल के समीप करवाया।

बप्पा रावल ने इसे मौर्य शासक मान मौरी से जीता था।

गुहिलों ने नागदा के विनाश के बाद इसे अपनी राजधानी बनाया।

यह हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर कहलाता है। इसे प्राचीन किलों का सिरमौर भी कहते हैं।

– इसके 7 प्रवेश द्वार (हनुमान पोल, भैरव पोल, चामुण्डा पोल, राम पोल, तारा पोल, राज पोल, महालक्ष्मी पोल) है।

– विशाल व्हेल मछली के समान आकृति वाले गिरि दुर्ग चित्तौड़गढ़ किले के सर्पाकार प्रवेश मार्ग में सात विशाल द्वार है।

इस दुर्ग में राणा कुम्भा का महल, रानी पद्मिनी का महल, फतह प्रकाश महल, विजय स्तम्भ, कुंभश्याम मंदिर, मीराबाई का मंदिर, तुलजा भवानी का मंदिर आदि है।

रास्ते में जयमल एवं फत्ता (उदयसिंह के वीर सिपाही) की छतरियाँ हैं।

पदमिनी महल : सूर्यकुण्ड के दक्षिण में तालाब के मध्य में बने स्थित रावल रत्नसिंह की रानी पदमिनी का महल दर्शनीय है।

कुम्भ-श्याम मंदिर (वैष्णव मंदिर) तथा मीरा बाई का मंदिर : 1449 ई. में महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित कुम्भ-श्याम मंदिर इण्डो- आर्यन स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट नमूना है।

कुम्भ-श्याम मंदिर के अहाते में मीराबाई का मंदिर है। इस मंदिर में मुरली बजाते हुए श्रीकृष्ण एवं भक्ति में लीन भजन गाती हुई मीरा का चित्र लगा है। मीरा मंदिर के सामने मीरा के गुरु रैदास की स्मारक छतरी बनी हुई है।

विजय स्तम्भ

– 122 फीट ऊंचे (9 मंजिला) इस स्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा द्वारा मालवा (सुल्तान महमूद खिलजी) विजय की स्मृति में करवाया गया। इसको प्रशस्तियों में कीर्ति स्तम्भ कहा गया है।

– इस स्तम्भ की आठवीं मंजिल पर अल्लाह खुदा हुआ है। इसका निर्माण कार्य जैता तथा उसके पुत्र नामा, पोमा तथा पूंजा के निर्देशन में किया गया।

जेम्स टॉड ने इसे कुतुबमीनार से श्रेष्ठ इमारत माना है।

इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष कहा जाात है।

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति लेख (1460 ई.) – प्रस्तुत प्रशस्ति चित्तौड़ के कीर्ति स्तम्भ की कई शिलाओं पर उत्कीर्ण श्लोकों का सामूहिक नाम है।

इसके प्रथम दो श्लोकों में शिव एवं गणेश की स्तुति की गई है। श्लोक 3 से 8 तक बापा का वर्णन (बापा को पराक्रमी एवं शिवभक्त कहा गया है, फिर हम्मीर वर्णन किया गया है।

इस प्रशस्ति से कुम्भा के विरूदों (दानगुरु राजगुरु, शैलगुरु), उनके द्वारा विरचित ग्रंथों व उनके द्वारा कीर्ति स्तम्भ, कुम्भलगढ़, अचलगढ़ आदि दुर्गों में की गई प्रतिष्ठाओं का बोध होता है।

इसमें मालवा और गुजरात की सम्मिलित सेनाओं को परास्त करने का वर्णन मिलता है जो इसके सिवा अन्यत्र नहीं मिला। सार रूप में इस प्रशस्ति में मेवाड़ महाराणाओं (हम्मीर, कुम्भा आदि) की उपलब्धियों तथा 15वीं शताब्दी के राजस्थान के सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन की पर्याप्त जानकारी मिलती है।

इसके प्रशस्तिकार कवि अत्रि थे, लेकिन इनका निधन हो जाने के कारण इनके पुत्र कवि महेश भट्ट ने इसे पूरा किय जिसका उल्लेख इस प्रशस्ति में मिलता है।

श्रृंगार चँवरी : किले में स्थित शांतिनाथ जैन मंदिर जिसे महाराणा कुंभा के कोषधिपति के पुत्र वेलका ने बनवाया था। इसके मध्य में एक छोटी सी वेदी पर चार खम्भों वाली छतरी बनी हुई है।

ऐसा माना जाता है कि यह महाराणा कुंभा की राजकुमारी के विवाह की चंवरी है अर्थात् यह पाणिग्रहण संस्कार का स्थल है।

इसीलिए यह शृंगार चंवरी के नाम से जानी जाती है। |

भोपालसागर झील : इस झील का निर्माण महाराणा भोपालसिंह ने करवाया था।

इस झील में मातृकुण्डिया में बने बनास नदी के बांध से पानी लाया गया है।

भैंसरोड़गढ़ : बामनी और चम्बल नदियों के संगम पर स्थित एक ऐतिहासिक स्थान। इसके निकट ही चम्बल नदी का प्रसिद्ध चूलिया जलप्रपात स्थित है।

भैंसरोड़गढ़ अभ्यारण्य : 1983 में स्थापित इस अभ्यारण्य में तेंदुआ, साम्भर, चौसिंगा एवं चीतल अधिकता से पाये जाते हैं। इस अभ्यारण्य के मुख्य वन क्षेत्र में धौंक के वृक्षों की प्रधानता है।

बाडोली : भैंसरोड़गढ़ से 5 किमी. दूर स्थित स्थल। यहाँ घाटेश्वर शिवालय के नाम से प्रसिद्ध शिव मंदिर स्थित है जिसका निर्माण तोरमाण पुत्र मिहिरकुल ने करवाया। यह मंदिर कामनीय मूर्तियों से भरा पड़ा है।

कालिका माता का मंदिर : इसका निर्माण मेवाड़ के गुहिल वंशीय राजाओं ने 8वीं-9वीं शताब्दी में करवाया था।

प्रारम्भ में यह सूर्य मंदिर था मुगलों के आक्रमण क समय सूर्य की मूर्ति तोड़ दी गई। तदुपरान्त कालान्तर में उसकी जगह कालिका माता की मन्दिर स्थापित की गई। महाराणा सज्जन सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

केसरपुरा : यहाँ हीरे की खान स्थित है।

कपासन : प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र जहाँ नारियल के खोल की चूड़ियाँ बनाने का शिल्प विख्यात है। यहाँ हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल पर आधारित राजस्थान के द्वितीय जिंक स्मैल्टर प्लांट की स्थापना की जा रही है।

मातृकुण्डिया मंदिर : बनास नदी के तट पर राश्मी नामक तहसील मुख्यालय में स्थित भगवान शिव का मंदिर जो मेवाड़ के हरिद्वार के रूप में जाना जाता है। मातृकुण्डिया एकी आन्दोलन के लिए प्रसिद्ध स्थल है।

समिद्धेश्वर महादेव,मोकलजी का मंदिर -नागर शैली में बने इस शिव मंदिर का निर्माण मालवा के परमार राजा भोज ने करवाया तथा महाराणा मोकल ने 1428 में इसका जीर्णोद्धार करवाया। 8 बस्सी अभ्यारण्यः इस अभ्यारण्य की स्थापना 1988 में की गई।

रावतभाटा : देश में परमाणु ऊर्जा उत्पादन का सिरमौर।।

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